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Parivartini Ekadashi-परिवर्तिनी एकादशी

भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष में जो एकादशी आती है उसे परिवर्तिनी एकादशी कहते है। परिवर्तिनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु के वामन अवतार की पूजा की जाती है। इसे भारत के कई क्षेत्रों में पार्श्व एकादशी के रूप में भी जाना जाता है। इस एकादशी पर भगवान विष्णु शयन करते हुए करवट लेते हैं इसलिए इस एकादशी को परिवर्तिनी एकादशी कहा जाता है।वामन अवतार में ही तीन पदों में विष्णु जी ने राजा बलि का सारा राजपाठ नाप लिया था। पार्श्व एकादशी पवित्र चतुर्मास की अवधि के समय आती है तो इसे अत्यधिक भाग्यशाली और शुभ माना जाता है। इसे पद्मा एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। इस व्रत में भगवान विष्णु के वामन अवतार की पूजा करने से वाजपेय यज्ञ के समान फल प्राप्त होता है और मनुष्य के समस्त पाप नष्ट होते हैं। यह देवी लक्ष्मी का आह्लादकारी व्रत है इसलिए इस दिन लक्ष्मी पूजन करना श्रेष्ठ माना गया है।

Parivartini Ekadashi Fast Date And Auspicious Time-परिवर्तिनी एकादशी व्रत तिथि और मुहूर्त 2024

शनिवार 14 सितंबर 2024
एकादशी तिथि प्रारंभ- 22:34 – 13 सितंबर 2024
एकादशी तिथि समाप्त-20:41 – 14 सितंबर 2024

Parivartini Ekadashi Puja Method-परिवर्तिनी एकादशी पूजा विधि

  1. सुबह उठकर स्नान करने के बाद साफ कपड़े पहने जाते हैं।
  2. जिस स्थान पर पूजा की जाती है, उस स्थान पर गंगाजल डालकर उस स्थान को पवित्र किया जाता है।
  3. इसके बाद एक चौकी रखी जाती है और उस पर पीले रंग का कपड़ा बिछाया जाता है।
  4. फिर भगवान लक्ष्मी नारायण की प्रतिमा उस पर विराजित की जाती है।
  5. इसके बाद दीपक जलाया जाता है और प्रतिमा पर कुमकुम या चंदन का तिलक लगाया जाता है।
  6. प्रतिमा के सामने हाथ जोड़कर भगवान विष्णु का ध्यान किया जाता है।
  7. इसके बाद प्रतिमा पर तुलसी के पत्ते और पीले फूल अर्पित किए जाते हैं।
  8. तुलसी के पत्ते और फूल अर्पण करने के बाद विष्णु चालीसा, विष्णु स्तोत्र और विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ किया जाता है। इस दिन भगवान विष्णु के मंत्रों का नाम का जाप अवश्य किया जाता है।
  9. फिर विष्णु जी की आरती की जाती है।उनसे पूजा में हुई गलतियों के लिए क्षमा मांगी जाती है और फिर किसे पीले फल या मिठाई का भोग लगाया जाता है।

Parivartini Ekadashi Significance-परिवर्तिनी एकादशी महत्व

परिवर्तिनी एकादशी व्रत भक्तों द्वारा सदियों से किया जा रहा है। हिंदू मान्यताओं के अनुसार यह माना जाता है कि जो भक्त पूरे विधि विधान के साथ इस व्रत का पालन करते हैं उन्हें अच्छे स्वास्थ्य, धन और सुख की प्राप्ति होती। यह व्रत अज्ञानता का नाश करता है। इस दिन मां लक्ष्मी की पूजा करने से उनकी कृपा भी प्राप्त होती। इसके साथ यह भी माना जाता है कि इसी दिन भगवान अपने पांचवें अवतार यानी वामन अवतार में पृथ्वी पर आए थे इसलिए इस दिन वामन जयंती भी मनाई जाती है।

Parivartini Ekadashi fast story-परिवर्तिनी एकादशी व्रत कथा

महाभारत काल के समय पाण्डु पुत्र अर्जुन के आग्रह पर भगवान श्री कृष्ण ने परिवर्तिनी एकादशी के महत्व का वर्णन सुनाया। भगवान श्री कृष्ण ने कहा कि- हे अर्जुन! अब तुम समस्त पापों का नाश करने वाली परिवर्तिनी एकादशी की कथा का ध्यानपूर्वक श्रवण करो।त्रेतायुग में बलि नाम का असुर था लेकिन वह अत्यंत दानी,सत्यवादी और ब्राह्मणों की सेवा करने वाला था। वह सदैव यज्ञ, तप आदि किया करता था। अपनी भक्ति के प्रभाव से राजा बलि स्वर्ग में देवराज इन्द्र के स्थान पर राज्य करने लगा। देवराज इन्द्र और देवता गण इससे भयभीत होकर भगवान विष्णु के पास गये। देवताओं ने भगवान से रक्षा की प्रार्थना की। इसके बाद मैंने वामन रूप धारण किया और एक ब्राह्मण बालक के रूप में राजा बलि पर विजय प्राप्त की।

भगवान श्रीकृष्ण ने कहा- वामन रूप लेकर मैंने राजा बलि से याचना की- हे राजन! यदि तुम मुझे तीन पग भूमि दान करोगे, इससे तुम्हें तीन लोक के दान का फल प्राप्त होगा। राजा बलि ने मेरी प्रार्थना को स्वीकार कर लिया और भूमि दान करने के लिए तैयार हो गया। दान का संकल्प करते ही मैंने विराट रूप धारण करके एक पांव से पृथ्वी, दूसरे पांव की एड़ी से स्वर्ग तथा पंजे से ब्रह्मलोक को नाप लिया। अब तीसरे पांव के लिए राजा बलि के पास कुछ भी शेष नहीं था। इसलिए उन्होंने अपने सिर को आगे कर दिया और भगवान वामन ने तीसरा पैर उनके सिर पर रख दिया। राजा बलि की वचन प्रतिबद्धता से प्रसन्न होकर भगवान वामन ने उन्हें पाताल लोक का स्वामी बना दिया।

Mantra for Parivartini Ekadashi fas-परिवर्तिनी एकादशी व्रत का मंत्र

ऊं नारायणाय विद्महे। वासुदेवाय धीमहि। तन्नो विष्णु प्रचोदयात्।।

शांताकारं भुजङ्ग शयनम पद्म नाभं सुरेशम।

विश्वाधारं गगनसद्र्श्यं मेघवर्णम शुभांगम।

लक्ष्मीकान्तं कमल नयनम योगिभिर्ध्यान नग्म्य्म।

वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्व लोकेकनाथम।।

हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।

हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।।

श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी, हे नाथ नारायण वासुदेवा।

ओम नमो नारायणा।

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